न्याय करीब लाते हुएः तकनीक से न्याय तक पहुँचने पर एक प्रयोग

न्यायिक शक्तिकरण ग़रीब और अलग-थलग समुदायों को विकास और निर्णय लेने में भागीदार बनाने में सक्षम करता है और नयी तकनीकें भारत में महिलाओं को प्रणाली में उपस्थित समस्याओं के विरोध में आवाज़ उठाना मुमकिन करती हैं।


By: Shreya Sen
July 17, 2018

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Photo:Evgeniya Stanevich

India’s legal and policy framework provides for a range of social benefits and entitlements to ensure that poorest citizens can live a life with dignity.


 

पिछले दो दशकों के दौरान न्याय को न्यायालयों से बाहर लाकर जनता के हाथों में देने के लिये एक जमीनी कानून बनाने का आन्दोलन बना है। एक ऐसे समय में जबकि अलग-अलग विचारों के लिए स्थान कम होता जा रहा है और नागरिकों के अधिकारों पर सरकार का पूंजीवादी स्वार्थ प्रधानता ले चुका हैए न्यायिक शक्तिकरण गरीब और हाशिये पर पडे समुदायों को विकास और निर्णय लेने में हिस्सेदार बनाने का रास्ता बना रहा है। संवैधानिक अधिकार और पात्रतायें एक अर्थपूर्ण और सूचनापूर्ण तरीके से जान सकेंए यह सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक शक्तिकरण नये रूप लेता है और नये नये रास्तों का सहारा ले रहा है।

नये तकनीकी उपकरण एक तरह की नयी खोज है जो न्यायिक शक्तिकरण के प्रयासों को मुश्किल जगहों पर पहुँचने में मदद करते हैं। नज़दीक - भारत में अधिकारों तक पहुंचने पर ध्यान केन्द्रित करनेवाला एक ज़मीनी-अधिकार संगठन - समुदाय नेतृत्व नीति और न्यायिक वकालत के व्यवस्थित मुददों को बताने के ध्येय के साथ 2012 से असम में चाय के खेतों के मजदूरों और दिल्ली में झुग्गियों में रहनेवालों के साथ काम कर रहा है।

भारत का कानूनी और नीति ढांचा सामाजिक हितों और हक़ों की एक श्रेणी देता है यह सुनिश्चित करने के लिए कि सबसे गरीब नागरिक तक एक इज्ज़त की ज़िंदगी जी सकें। इनमें से कुछ हक़ संविधान में प्रतिष्ठापित है जबकि कुछ दूसरे अधिकार सामाजिक आंदोलनों के संघर्षों से हासिल किये गये हैं। हालाँकि अपर्याप्त संसाधन आवंटन व्यापक भेदभावए भ्रष्टाचार और सेवा वितरण बुनियादी ढांचे की अक्षमता जैसे कारणों से इन कानूनों और नीतियों के कार्यान्वयन बहुत बेकार हैं।

इस तरह से बडे पैमाने पर फैली कार्यान्वयन समस्याओं के कारण सारे देश के लोगों को अभी भी खानाए साफ़ पानीए शौच-सुविधायें और जरूरी स्वास्थ्य की देखभाल जैसे मूलभूत सेवायें उपलब्ध नहीं हैं। यह दलितए आदिवासी और मुस्लिम महिलाओं के बारे में विशेष रूप से सही है जिन पर बड़े गहरे पितृसत्तात्मक समाज का बोझ है जो जाति और वर्ग पर आधारित और आर्थिक अवस्था पर बंटा है। वे उन ज़रूरी सेवाओं से दैनिक रूप से वंचित हैं जिनकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत है। बडी मातृ मृत्यु दर और विकृति और बाल कुपोषण की मौजूदगी बढे हुए लिंग भेदभाव के प्रमुख अंतर्निहित सूचक हैं। महिलाओं और लड़कियों का स्वास्थ्य और हित उनके खान-पान और स्वास्थ्य की देखभाल की गुणवत्ता से उनकी गर्भावस्था के दौरान उनके बच जाने और उनके शिशुओं के स्वस्थ होने के मौके बढ़ जाते हैं। वास्तव में भारत में शिशु मृत्यु दर ;छथ्भ्ै.4 के अनुसार 41द्ध अभी भी एशिया और दूसरे क्षेत्रों से पिछड़ी हुई है  ;जैसे कि बांग्लादेश 31 नेपाल 29 और रूआण्डा 31द्ध।

इस तरह की पृष्ठभूमि पर यह आश्चर्य की बात नहीं है कि औरतों के पास अपनी पीड़ा को ज़ाहिर करने और अपने अधिकारों और हितों तक पहुँचने के लिए प्रभावी ज़रियों की कमी हो। मौजूद शिकायत प्रणाली अलग-थलग पड़े नागरिकों की पहुँच से बाहर हैं जिन्हें सरकार की सामाजिक नीतियों के प्रमुख प्राप्तकत्र्ताओं के रूप में सेवाएं उपलब्ध करानेवाली संस्थाओं के साथ संपर्क करने के ज़रियों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। इसके अलावा इन समुदायों के सदस्यों के पास अकसर उनके अधिकारों और हितों पर नज़र रखने और उनका उल्लंघन दर्ज़ करने या सेवा प्रदान करने में व्यवस्थित कमियों को पहचानने के ज़रिये और इसकी क्षमता नहीं है। ढांचे पर नज़र रखने और निवारण खोजने के ज़रियों की कमी इन वर्गों को उनके पहले से ही कठिन जीवन की परिस्थितियों को और अधिक कठिन बनाकर और भी हाशिये पर और पिछडे़पन की ओर धकेल देगी।

इसलिए एक अधिक गरिमापूर्ण जीवन के आश्वासन और अलग-थलगकरण के चक्र को तोड़ने के लिए सरकारी सेवाओं पर नज़र रखने में महिलाओं का भाग लेना एक ज़रूरी कदम है। 2007 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में समुदाय निगरानी पर प्रायोगिक परियोजना में सहयोग दिया जिसने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि समुदाय सदस्यों को शामिल करने वाले प्रयासों पर नियंत्रण से नागरिकों और सरकारी महकमों के बीच भागीदारी बढ़ी। इससे भी आगे जायें तो यह निगरानी अलग-थलग समुदायों को अपनी प्राथमिकताओं बताने और योजना बनाने वाली सरकार को उनकी जिंदगी को प्रभावित करने वाले मुददों की सूचना देने का एक रास्ता भी हो सकती है।

इस बात को ध्यान में रखते हुए नज़दीक ने दिल्ली और असम में कानूनी रूप से प्राप्त ज़रूरी सेवाओं पर निगराने रखने और व्यक्तिगत अधिकार उल्लंघन का निवारण खोजने और व्यवस्थित रूप से सुधार के लिये सामूहिक रूप से हिमायत करने के लिये प्रभावी और सुगम नीतियों के विकास के लिए पैरालीगल समुदायों का साथ लिया। हमने एक समुदाय नियंत्रण प्रणाली स्थापित की जिसने तकनीक की ताकत का इस्तेमाल करके पैरालीगल्स के लिये निगरानी को सुगम बनाया जबकि उसी समय इससे उन्हें बड़ी मात्रा में आंकड़े जुटाने में मदद मिली।

तकनीक को स्थापित करने में नजदीक ने भेदभाव के विरूद्ध वकीलों के लिए अंतर्राष्ट्रीय केन्द्र ;प्दजमतदंजपवदंस ब्मदजमत वित ।कअवबंजमे ।हंपदेज क्पेबतपउपदंजपवदद्ध के साथ पार्टनरशिप की। इस सहयोग से समुदाय के पैरालीगल्स और नजदीक ने एक संकेत-प्रणाली का विकास किया जो भोजनए स्वास्थ्यए पानी और शौच के अधिकारों की सीमा को एक संख्या का कोड देता है। इस प्रणाली से पैरालीगल्स ने ैडै मैसेज में संबंधित कोड के साथ उन अधिकारों के उल्लंघन का रिपोर्ट दर्ज़ की जो उनके या उनके समुदायों के सदस्यों के साथ हुआ। नजदीक-कर्मचारियों ने तब ैडै प्राप्त किया और फोन पर या ख़ुद जाकर रिपोर्ट की पुष्टि की।

आंकडे एक ओपन-सोर्स उषाहिदी प्लेटफार्म पर एकत्रित हैं ेउेवितरनेजपबमण्वतह ;दिल्लीद्ध और मदकउउदवूण्वतह ;असमद्ध ने उसे सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं तथा इस पर पैरालीगल्स एवं संबंधित प्राधिकारियों के बीच होने वाली मीटिंग्स में समय≤ पर चर्चा होती है।

महिलाओं में नेतृत्व स्थापित करने के लिये एक साधारण सी ैडै तकनीक का इस्तेमाल करना उन चुनौतियों को जीतने में एक महत्वपूर्ण मार्ग रहा है जिनका औरतें पारंपरिक रूप से सामना करती हैं जब तकनीकी-साक्षरता की बात हो जो लिंग-भेदभाव में निहित हैं जो उनके लिये तकनीक का रास्ता बंद करता है। इस साधन से हाशिये पर पडे समुदाय की औरतों को मानीटर करने अधिकार-उल्लंघन को रिपोर्ट करने और चाय के बागानों जैसे पहुँच के बाहर समूहों के आंकड़ों को एकत्रित करने में सक्षम बनाया है। इस प्रणाली की मदद से नजदीक के प्रशिक्षित पैरालीगल्स ने बहुत कम समये में बडे पैमाने पर आंकड़े इकटठे किये और स्वास्थ्यए भोजनए पानी और शौच-सुविधाओं के प्रदान से जुड़े ढांचागत मुददों को पहचानने में भी।

एकत्रित आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर एक निश्चित मुददे से निबटने के लिये सबसे कारगर नीति पर निर्णय लेने में हम सक्षम हैं। जैसे कि कुछ शिकायतें संबंधित सरकारी महकमों की ओर हैं तो कुछ जरूरी सूचना में कमी को जानने की तरफ और कुछ मामलों में वे समुदाय के नेतृत्व में याचिका के लिये शुरूआत का मुददा है। एक जरूरी मैटरनिटी लाभ योजना के समय पर कार्यान्वयन के लिय हाल ही में दर्ज़ एक जनहित याचिका जो पूरे देश में ग़रीबी की रेखा के नीचेवाली सारी गर्भवती महिलाओं को प्रभावित करेगी इसका एक उदाहरण है।

जवाबदेह शासन को सुनिश्चित करने के लिये समुदाय के सदस्यों का भाग लेना जरूरी है। भारत के बहुत से कानून एक विकेन्द्रीकृत तंत्र की माँग करते हैं जो लोगों की दैनिक मूलभूत सार्वजनिक वस्तुओं और सेवाओं के बारे में शिकायतों से संबंधित है। उनके वादों को पूरा करने के लिये सामूहिक संगठन के प्रयास करने चाहियें ताकि हाशिये पर पडे समुदायों की माँगें और ज़रूरतें सामने आयें। यह आवश्यक है कि महिलायें इस प्रक्रिया में बराबर हिस्सेदार बनें ताकि उनके आवाज़ और ज़रूरतें स्वीकार्य हों और बोली जायें।

समुदायों द्वारा एकत्रित आंकडों पर आधारित रिपोर्ट यहाँ देखी जा सकती हैंः Women Lead the Way: Monitoring and Improving Government Services and Facilities in Delhi (2018); SMS For Justice: Women Demand Vital Services in Delhi (2017); No Time To Lose: Fighting Maternal and Infant Mortality Through Community Reporting (2015)]

*** This article is part of a series on technology and human rights co-sponsored with Business & Human Rights Resource Centre and University of Washington Rule of Law Initiative.

 


श्रेया सेन एक नारीवादी (स्त्री अधिकारवादी) सक्रियतावादी और नज़दीक में एक वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी हैं।


 

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