मानवाधिकार संगठनों के लिए निधीकरण पर उसकी पकड़ के लिए भारत को चुनौती देने का समय

देश के सबसे जानकार मानव अधिकारों के विशेषज्ञों में से एक समझाते हैं कि उन मानवाधिकारों के कार्यों के लिए भारत किस तरह विदेशी अनुदान में रुकावट डालता है जिन्हें वह पसंद नहीं करता है। जनहितैषी उन कार्यों का समर्थन करने से बचते हैं जो सरकार को क्रोधित कर सकते हैं और इस कारणवश सबसे संवेदनशील मानवाधिकारों के मुद्दों से निपटने में सक्षम संगठन केवल वही हैं जो आम नागरिकों के छोटे-मोटे योगदान द्वारा वित्तीय सहायता प्राप्त करते हैं।


By: Ravi Nair
November 12, 2013

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भारत के बाहर इस बात पर कम ही चर्चा की जाती है कि मानवाधिकारों के कार्यो के लिए विदेशी अनुदान पर भारत सरकार का दृष्टिकोण रूस या रंगभेदी दक्षिण अफ्रीका से शायद उतना ही, या उससे अधिक, कठोर है। ग़ैर-सरकारी संगठनों के लिए विदेशी अनुदान के एक प्राचीन कानून का उपयोग करके, सरकार एक शल्य-चिकित्सक के स्कैलपल की तरह, बड़ी ही सावधानी और तीक्ष्णता से किसी भी असंतोष का दम घोंट देती है और बड़े स्तर की किसी भी ग़ैर-सरकारी गतिविधि को विनियमित करती है। भारत के एक महत्वपूर्ण व्यापार भागीदार होने के कारण, यूरोपीय सरकारें, जो मुगाबे के ज़िम्बाब्वे के लिए मानवाधिकार विश्वास के सच्चे रक्षक के रूप में उभर कर आती हैं, इस पर भारतीय सरकार को चुनौती देने में असफल हैं। 

तथाकथित विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) कानून के तहत, विदेशी निधिकरण प्राप्त करने की मांग करने वाले सभी संगठनों को पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय से अनुमति के लिए आवेदन करना होता है। इस कानून को 1975-1976 भारतीय आपातकाल के दौरान नागरिक समाज गतिविधि, विशेष रूप से गांधीवादी स्वैच्छिक समूहों के सत्तावादी शासन के प्रति विरोध, का दम घोंटने के लिए बनाया और अधिनियमित किया गया था। भारतीय सरकार उस समय से इस कानून का प्रयोग नागरिक समाज गतिविधि को नियंत्रित करने के लिए करती आ रही है। 

यदि आप विदेशी निधिकरण प्राप्त करने की अनुमति चाहते हैं, तो एफसीआरए कार्यालय आपके ऑफिस पर अपने खुफ़िया अधिकारियों को भेजता है और विस्तार से जाँचता है कि आप क्या कर रहे हैं। आवेदन की स्वीकृति या अस्वीकृति में दो साल तक का समय लग सकता है, जिसके दौरान खुफ़िया अधिकारी आपके यहाँ नियमित रूप से दौरा करते हैं। सरकार को संभावित रूप से शर्मिंदा करने वाली गतिविधियों के लिए बिना किसी स्पष्टीकरण अनुदान अवरोधित कर दिया जाता है। 

नतीजा ये है कि पिछले कुछ वर्षों से भारतीय मानवाधिकार संगठन स्वयं पर सेंसरशिप का काम कर रहे हैं। उदाहरणतः, यदि आपकी महिला अधिकार संगठन दहेज हत्या पर या लड़कियों की शिक्षा पर काफ़ी कार्य कर रही है, तो आप यह सीख लें कि आंतरिक संघर्ष स्थितियों में सशस्त्र बलों द्वारा बलात्कार के विशिष्ट मामलों पर काम नहीं करना चाहिए। यह एक no entry zone है। यही तथ्य बच्चों के अधिकारों और आदिवासी अधिकार संगठनों पर भी लागू होता है यदि वे किसी भी ऐसे मुद्दों पर काम करना चाहते हैं जो सरकार को लिप्त कर सकती हो। मेरे अपने संगठन, SAHRDC, ने पहले कूनन पोशपोरा के काश्मिरी गाँव में महिलाओं के साथ बलात्कार की जांच करने के लिए महिला प्रतिनिधियों को भेजने के लिए तीन प्रमुख विदेशी समर्थित संगठनों की सहायता लेने का प्रयास किया था। तीनों ने हमारा आमंत्रण  विनम्रता से अस्वीकार कर दिया।

अनुदान स्वतंत्रता की धारणा को प्रभावित करता है 

एक औसत नागरिक समझता है कि ग़ैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) को या तो अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा या भारत सरकार के विभागों द्वारा अच्छा अनुदान प्राप्त होता है। और यह माना जाता है कि अंतरराष्ट्रीय अनुदान के प्राप्तकर्ता विदेशी शक्तियों के हितों को आगे बढ़ाने के लिए वहाँ कार्य कर रहे हैं। भारतीय मीडिया इस धारणा को फैलाती है और भारतीय सरकारी मशीनरी, चाहे कोई भी पार्टी सत्ता में हो, इसे प्रोत्साहित करती है। 

जब इसकी नाकामियों को बेनकाब करने वाली ग़ैर-सरकारी पहलें सरकार को चिंतित करती हैं, तो आमतौर पर इन प्रयासों को दानवता का रूप दे दिया जाता है यह कहकर कि इसमें विदेिशयों का हाथ है जिनके भयावह इरादे हैं। हाल ही में तमिलनाडु राज्य में, कू़डनकूलम में परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने की योजना पर होने वाले बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन इस बात का एक उदाहरण है। सरकार ने स्थानीय ग्रामीणों और हज़ारों मछुआरों के इस उदासीन प्रतिरोध को ऐसे समझाया कि विरोध करने वालों को पैसों से भरे बैग द्वारा भुगतान उन विदेशी ताकतों द्वारा किया जा रहा है जो भारत को आर्थिक रूप से विकसित होने और एक वैश्विक शक्ति बनने से रोकना चाहते हैं। 

सौभाग्य से, भारत में ग़ैर-सरकारी गतिविधियाँ अलग-अलग हैं। ग़ैर-सरकारी क्षेत्र में कई ऐसे संगठन हैं जो स्वयं को स्वैच्छिक संगठनों या सामुदायिक संगठनों का नाम देकर सरकारी या विदेशी अनुदान प्राप्त करने वाले संगठनों से ख़ुद को अलग करने का प्रयास करते हैं। यह बिल्कुल सही है िक भारत में प्रमुख नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकार संगठन, अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए विदेशी या भारतीय सरकारी अनुदान स्वीकार नहीं करते हैं, जैसा िक 60, 70 और 80 के दशकों में वैश्विक स्तर पर एमनेस्टी इंटरनेशनल की नीति थी। 

ऐसी कई संगठनों, जैसे सिविल लिबर्टीज़ के लिए पीपल्स यूनियन (पीयूसीएल), डेमोक्रेटिक राइट्स के लिए पीपल्स यूनियन (पीयूडीआर), और आंध्र प्रदेश सिविल लिबर्टीज़ कमिटी (एपीसीएलसी), ने नागरिक अधिकारों के मुद्दों को देश भर में संबोधित किया है, और वह भी अक्सर अपने कार्यकर्ताओं और सदस्यों के लिए बड़े जोखिम के साथ। वे बहुत ही कम बजट पर काम करते हैं, जिसे केवल सदस्यता शुल्क और छोटे अनुदानों के माध्यम से पूरा किया जाता है। इस तरह से वित्त-पोषित संगठन कई दशकों से मानव अधिकार और लोकतांत्रिक अधिकारों के मुद्दों के एक रेंज पर प्रकाश डालने में सक्षम रहे हैं। 

भारतीय जन-हितैषी कहाँ हैं? 

यह सुनिश्चित है कि अतिरिक्त निधिकरण से बहुत कुछ हो सकता है। व्यापार जगत के नेता इन संगठनों में पैसे डाल सकते हैं, लेकिन जो इच्छुक होते भी हैं वे उन गतिविधियों में पैसे लगाने से दूर रहते हैं जो सरकार को चुनौती देते हैं। कुछ भारतीय व्यवसायी जन-हितैषी यातनाओं, ग़ैर-न्यायिक सज़ाओं या निष्पक्ष ट्रायलों का समर्थन करना चाहते हैं, परंतु जानते हैं कि इसके परिणाम उनके व्यापार को भुगतने पड़ेंगे। उनके पास बार-बार आयकर जांच के अनुरोध आने लगेंगे, सरकारी ठेके आने अचानक समाप्त हो जायेंगे, बैंक ऋण अस्वीकार कर दिए जायेंगे, और सरकारी अधिकारियों के साथ मुलाकात के अनुरोधों को कोई जवाब नहीं मिलेगा। 

हालांकि इनके पास धन की कमी होती है, पर इन समुदाय अधिकार समूहों के पास अपने विदेशी अनुदान प्राप्त करने वाले साथियों की तुलना में कठिन सवाल पूछने की स्वतंत्रता होती है। एक संगठन, डेमोक्रेटिक राइट्स के लिए पीपल्स यूनियन, की तो एक नीति है कि वह किसी भी एक स्रोत से रु 3000 से अधिक का दान स्वीकार ही नहीं करते हैं और इस प्रकार अपनी स्वतंत्रता को सुनिश्चित करते हैं।  

भारतीय सरकार यह जानती है कि अपने खुफ़िया अधिकारियों के साथ नियमित रूप से संपर्क आपको सरकारी मशीनरी के अनुरूप ही नहीं लाती है, बल्कि एजेंटों और मुखबिरों की भर्ती करने करने में खुफ़िया सेवाओं की सहायता भी करती है। सक्रियतावादियों को संदेह है कि कुछ मानवाधिकार संगठनों में सुरक्षा सेवाओं के घुसपैठिये उपस्थित हैं। यह केवल कुछ ही ग़ैर-सरकारी संगठनों के लिए सच है, परंतु यह इस बात का संकेत करती है कि सहयोगी संगठनों को विदेशी या सरकारी अनुदान या संरक्षण पाने के लिए क्या करना पड़ा होगा। 

आगे का रास्ता 

इस बीच, हाल ही में कूडनकूलम परमाणु ऊर्जा परियोजना के खिलाफ़ विरोध करने वाले इंडियन सोशल एक्शन फोरम (इंसाफ) जैसे संगठन, जो विदेशी अनुदान के उपयोग की सीमाओं को लांघने की कोशिश करते हैं, वे पाते हैं कि उनके एफसीआरए परमिट निलंबित कर दिए गए हैं। इंसाफ के बैंक खातों को सील कर दिया गया, इसे एक लंबी जांच से गुज़रना पड़ रहा है, और संगठन को प्रभावी ढंग से अपंग कर दिया गया है। पीपल्स वॉच तमिलनाडु जिसने इन विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था, उन्हें भी विदेशी अनुदान प्राप्त करने से रोक दिया गया है।  

इंसाफ ने सरकार के निर्णय को कोर्ट में चुनौती दी है यह तर्क पेश करके कि एफसीआरए कानून भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों के अध्याय के खिलाफ़ जाता है। 

दानदेने वाले देशों की सरकारों को अंतरराष्ट्रीय अनुदान पर भारत की प्रतिबंधात्मक नीतियों को चुनौती देते हुए साहसी संगठनों का समर्थन करते समय बेहतर उत्साही सार्वजनिक कूटनीति का उपयोग करना चाहिए। 

जबतक विदेशी दबाव से एफसीआरए में बदलाव नहीं लाया जाता, तबतक भारतीय नागरिक समाज वर्तमान में अधिक विदेशी अनुदान प्राप्त करने वाले भारी रूप से नियंत्रित ग़ैर-सरकारी संगठनों और सीमित स्थानीय निधिकरण वाले स्वतंत्र स्वदेशी पहलों के बीच फंस कर रह जाएगा। समुदाय से अनुदान प्राप्त करने वाले संगठनों को विकसित होने के लिए अपने स्थानीय समर्थक दाताओं को बढ़ाना चाहिए। परंतु, शायद यह विदेशी दाताओं से प्राप्त होने वाली आर्थिक सहायता जितना आकर्षक नहीं होगा। 

 


رافي ناير هو المدير التنفيذي لمركز جنوب آسيا لتوثيق حقوق الإنسان (SAHRDC). والمتلقي لجائزة ام ايه توماس، الوطنية لحقوق الإنسان في 1997. ولم يقبل مركز جنوب آسيا لتوثيق حقوق الإنسان قط التمويل من الحكومة الهندية كما لم يقبل أي استشارات دولية منذ 2006.


 

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