पंजाब में भूमि अधिकारों के लिए लड़ रही दलित महिलाओं से शिक्षा

पंजाब में - जहाँ लगभग 32 प्रतिशत आबादी दलित है - दलित महिलाएँ भूमि को जोतने के अधिकार के लिए लड़ रही हैं, और जीत भी रही हैं।



Carrying Mustard Greens. Punjab, India.


दलित महिलाओं के बारे में कहानियां अक्सर अनकही होती हैं, हालांकि इस सामाजिक वर्ग की महिलाओं को भारत में सबसे अधिक उत्पीड़ित सामाजिक समूह के रूप में जाति व्यवस्था के कारण भेदभाव का सामना करना पड़ता है। पंजाब, उत्तरी भारत में - जहाँ लगभग 32 प्रतिशत आबादी दलित है, एक गाँव में महिलाएँ  अत्यधिक भेदभाव और सामाजिक उत्पीड़न का हिस्सा हैं। इस व्यवहार के जवाब में, इस गाँव में 115 परिवारों की दलित महिलाओं ने लड़ाई लड़ी और उन्होंने जिस जमीन पर उनका हक था उसे जोतने का अधिकार हासिल किया। पहले इस जमीन पर उच्च जाति के लोगों का कब्जा था।

भारत के बाकी हिस्सों के विपरीत जहां जाति व्यवस्था सामाजिक संरचना के हिंदू रीति रिवाज़ों और ग्रंथों के साथ घनिष्ठ संबंध में है। पंजाब की अनूठी व्यवस्था जमीदारों - या जाट किसानों - को मालिक मानता है। ये वर्ग भारत में जाति-आधारित, जाति व्यवस्था में प्रताड़ित किए गए लोगों की एक बड़ी भूमिहीन श्रेणी “अनुसूचित जाति” (SC) पर अत्याचार करते है।

पंजाब में, स्थानीय राजस्व अधिकारी प्रत्येक वर्ष दो तरीकों से खेतीयोग्य भूमि की नीलामी करते हैं। नीलामी को जातिगत आधार पर विभाजित किया जाता है। एक “सामान्य” श्रेणी के लोगों के लिए और दूसरा अनुसूचित जाति के लोगों के लिए। हालांकि, 1950 के दशक के बाद से ही, जाट किसानों ने भूमि पर जाटों के प्रभुत्व को बनाए रखने के लिए स्थानीय नीलामी में अपने प्रतिनिधि दलित उम्मीदवारों को रखकर भूमि को हथियाने के लिए इन कानूनों का दुरुपयोग किया है।

लेकिन पंजाब के संगरूर जिले में दलित महिलाओं ने एक साथ आकर एक आंदोलन किया, जिसमें उन्होंने ज़मीन की इस फर्ज़ी नीलामी का बहिष्कार किया और राज्य में भूमि कानूनों को बहाल किया। यह सामाजिक परिवर्तन एक जटिल संदर्भ में अपने गौरव के लिए लड़ रहे पंजाबी दलित किसानों के लिए एक मिसाल कायम कर रहा है।

वर्ष 2014 में, भूमि प्राप्ति संघर्ष समिति, एक सामाजिक-सांस्कृतिक पंजाबी आंदोलन, जिसका नेतृत्व एक उच्च जाति ब्राह्मण ने दूसरों के साथ मिलकर किया। उन्होंने एक दलित महिला से शादी की थी। उन्होंने राज्य में भूमिहीन दलित किसानों की इन स्थितियों के बारे में रौशनी डाली। जैसे-जैसे आंदोलन मजबूत होता गया, दलित किसानों के लिए भूमि की पहुंच और विशेष रूप से दलित महिलाओं की दुर्बलता और उनके प्रति हिंसा के अधिक प्रमाण सामने आए। आंदोलन ने तर्क दिया कि एक असमान सामाजिक व्यव्स्था के तहत भी, पंजाब रूरल कॉमन लैंड एक्ट, 1961 और नजूल लैंड (ट्रांसफर) रूल्स, 1956 जैसे कानून, दलित किसानों को गाँव की सामूहिक स्वामित्व वाली जमीन के एक हिस्से को जोतने और इसके मालिक होने की गारंटी देते हैं।

हालाँकि इस भूमि आंदोलन की महिला सदस्यों को मारपीट और उनके परिवारों को जेलों में बंद करने और चुप कराने जैसे परिणाम भुगतने पड़े हैं, लेकिन उन्होंने अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनों को लागू करने के अपने कोशिशों को जारी रखा। दलित महिलाओं के लिए, खेती अक्सर उनके पशुओं के लिए पानी या चारे से संबंधित होती है, लेकिन ये दैनिक गतिविधियां भी हिंसा के उदाहरणों से भरी पड़ी हैं। उदाहरण के लिए, एक महिला, स्मृति कौर, ने साझा किया:

“एक बार मैं खेतों में गेहूं काटने जा रही थी, और उन्होंने यह कहकर मेरे पीछे एक ट्रैक्टर लगा लिया,

‘तुम बस अभी इस जगह को छोड़ दो!’ जब ट्रैक्टर मेरे पीछे था, तब भी मैं वहीं खड़ी थी।

बाकी लोग भाग गए, लेकिन मैं रुकी रही और उन्हें (जाट किसानों को) कहा कि वो मुझे मारें अगर वे ऐसा करने की हिम्मत रखते हैं तो ... उन्होंने कभी भी हमें ट्रैक्टर से धक्का नही दिया, वो बस हमें सिर्फ धमकियां देते थे ... किसी को धमका देना और हत्या करना आसान नहीं होता ... ”

हालांकि, साल 2014 में, इन दलित महिलाओं ने सहकारी खेती की दिशा में पहला सफल कदम पूरा किया जब उन्होंने भूमि की नीलामी का बहिष्कार किया, सामान्य भूमि पर कब्जा किया और गाँव की सामान्य भूमि को ठेके पर  लेकर खेती करने के लिए अपने नाकाफ़ी वित्त स्त्रोत तैयार करने शुरू कर दिए। सफलतापूर्वक, सहकारी खेती ने सामान्य जमीन की बिजाई और खेती की, प्रत्येक परिवार के सदस्य को दो क्विंटल चावल (200 किलोग्राम) मिलने और किसानों को अपने ऋण को चुकाने के लिए आवश्यक लाभ कमाने की शुरुआत की। अब समुदाय की महिलाओं में विश्वास की एक नई भावना पैदा हुई है, क्योंकि वे भूमि को जोतने, भोजन प्राप्त करने और जाट किसानों के साथ झगड़े से बचने के लिए आत्मनिर्भर बन गई हैं।

हालांकि, कई दलित किसान नीलामी का बहिष्कार करते हैं और उनका जो अधिकार है उसको प्राप्त करते हैं, लेकिन अभी भी कई बाधाएं सामने आ रही हैं। आंदोलन के फायदों के बावजूद, गांव में अलग- अलग धड़े हैं और विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रति उनकी निष्ठा के कारण विवाद बढ़ गए हैं। दरअसल, माया - जो किसी महिला आंदोलन की नेता हैं - बोलती हैं, स्थानीय “जागो” से संगीत की आवाजें आती हैं, “दलित विरोधी” समुदाय द्वारा मनाया जाता जश्न, जो मुख्य रूप से गांव की किसानी में उच्च जातियों के पक्षपाती हैं।

इसके अलावा, इस कानून के लागू होने से क्षेत्र में भूमि के उपयोग के कानून में बदलाव आया है। जैसा कि दलित समुदाय ने भविष्यवाणी की थी, 25 जनवरी, 2020 को सरकार ने सामन्य संपत्ति की भूमि पर कानून में संशोधन किया था। यह परिवर्तन यह सुनिश्चित करता है कि अब पंजाब में सामान्य संपत्ति की भूमि को व्यापार और उद्योग के लिए खरीदा जा सकता है और एक बार फिर से यह परिवर्तन दलित सहकारी किसानों की आजीविका को खतरे में डाल रहा है।

वास्तव में, बहुत सारे युवा दलित अब पूरी तरह से कृषि से भाग रहे हैं और जाति-आधारित समाज में अपनी गरिमा वापस पाने की इच्छा रखते हैं। उदाहरण के लिए, माया की बेटियां हैं, जिन्होंने अभी-अभी स्कूली शिक्षा पूरी की है। वे कृषि में काम ना करके सरकारी नौकरियों में काम करने या अपनी शिक्षा जारी रखना चाहती  है।

दलित किसानों के लिए एक और आगामी चुनौती संगरूर जिले में उद्योगपति लक्ष्मी मित्तल के संभावित औद्योगिक पेट्रो केमिकल प्लांट की योजना की खबर है, जो इस क्षेत्र का दौरा कर चुके हैं। यह खबर सहकारी किसानों के बीच ख़लबली पैदा कर रही है। जो हैरान हैं कि सामुदायिक संपत्ति की भूमि पर उनके लाभों का क्या होगा? यह एक तनावपूर्ण वातावरण है; उन्हें डर है कि हाल ही में जब्त की गई भूमि उनकी सहमति के बिना वंहा आनेवाले औद्योगिक प्लांट /पार्क को दी जाएंगी।

उद्योगपतियों को जवाब देते हुए बालद कलां के निवासियों ने यह कहते हुए एक प्रस्ताव पारित किया है कि वे केवल नदी के उस पार की भूमि को ही उद्योग को सौंपेंगे। नदी एक मार्कर के रूप में कार्य करती है क्योंकि उन्हें इस बात का दर्दनाक निर्णय लेना था कि उद्योग के लिए किस भूमि को सौंपना है। इसके बावजूद, जिला विकास पी.ओ., या स्थानीय सरकारी अधिकारी, ने बताया कि किसानों ने पहले ही जमीन सौंपने के लिए अपनी आम सहमति दे दी है। भारत में जमीन हड़पने वाले उद्यमियों द्वारा निर्धारित की गई उदाहरण में स्थानीय समुदायों को उनकी जमीन से बाहर निकालना, कभी-कभार ही रोजगार उपलब्ध करवाना और उनके द्वारा अधिकारों के लिए या पर्यावरण प्रदूषण के खिलाफ लड़ने के लिए उन्हें यातनाएं देना और सजा देना है। क्यूंकि कॉरपोरेशन इन ज़मीनों पर कब्ज़ा करती हैं और उद्योग से होने वाले प्रदूषण के नुकसान के बजाय अपने लाभ पर ध्यान देती हैं।

हाल ही में, भूमि आंदोलन ने गांव की सामान्य भूमि पर 33 साल के पट्टे की मांग की थी, जो आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुनिश्चित करेगी। जैसे-जैसे दलित महिलाओं की आवाजें बुलंद होती हैं, और जैसे-जैसे वे जमीन पर खेती के जरिए खुद को स्थापित करती हैं, उनका आंदोलन मजबूत हो रहा है।

उच्च जातियों द्वारा अपमान के अनुभवों और अपने ही हकों को प्राप्त करने की चुनौतियों से दलित महिला किसानों के बीच एकजुटता नेटवर्क खड़ा हुआ है। एकजुटता और संगठित आंदोलन की गतिविधियों से न केवल लिंग और जाति के संबंध बेहतर हुए, बल्कि नए खतरों के बावजूद उनकी आजीविका के लिए, इस ने इस क्षेत्र में कृषि के भविष्य और किसानों की स्वायत्तता के लिए एक नईं उम्मीद की भावना जगाई है।

 

ORIGINALLY PUBLISHED: March 31, 2020

तारिणी मनचंदा एक फिल्म निर्माता हैं, वे पर्यावरण और सामाजिक आंदोलनों के बारे में कहानियां बताती हैं।


 

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